पंक्तियाँ

बरसों पुरानी चंद पंक्तियाँ

स्मृति की तह पर आ गई

धीरे धीरे रे मना

धीमे से थपका गई

देख आसमाँ में बादल ठहरे

सूरज की गति देख

चाँद भी खिसकता सा

बयार की तसल्ली देख

लगता सब दोहरा रहे

धीरे धीरे रे मना

कर धीमी रफ़्तार तूँ

आस पास भी देख ज़रा

पूछना चाहूँ मैं उनसे

क्यूँ शामिल नहीं हर दौड़ हुए

प्रकृति प्रदत तसल्ली तुम्हारी

या इच्छाओं से मुक्त हुए